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परमात्मा से वार्तालाप

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परमात्मा से वार्तालाप

सदियों से इंसान परमात्मा को जानने के बारे में जिज्ञासु रहा है. परमात्मा के दर्शन के लिए या परमात्मा को महेसुस करने के लिए इंसान ने बहुत प्रयास किये है. और इस लिए इंसान आज तक परमात्मा को मंदिरों में, मस्जिदों में और गिरजाघरों में खोजता रहा है. जिन लोगों का दावा है की उन्होंने परमात्मा को महेसुस किया है या साक्षात्कार किया है उनका कहेना है की परमात्मा का वर्णन नहीं किया जा सकता , परमात्मा को इंसान सिर्फ महेसुस कर सकता है, लेकिन जिन्होंने महेसुस किया है उनकी यह मर्यादा है की वह अपने अनुभव को दुसरे इंसान को बता नहीं सकता.

कुछ तथा कथित अध्यात्मिक गुरु तो यह भी कहते है की वह आपको परमात्मा से मिलवा सकते है. लेकिन ध्यान रहे आपको परमात्मा से यदि कोई मिलवा सकता है तो वह आप खुद ही है कोई और नहीं. यह सत्य है की सद्गुरुर आपको परमात्मा से संपर्क स्थापित करने का तरीका बता सकते है. परमात्मा कहीं मंदिरों में मस्जिदों में या गिरजा घरों में नहीं है वह आपके भीतर ही है , आपके बाहर नहीं. जब कभी भी इंसान मंदिर मस्जिद या गिरजाघर  में जाता है तब वह मन ही मन परमात्मा से बात करने की कोशिश करता है प्रार्थना के जरिये. अपने जीवन के दुखों को दूर करने की प्रार्थना करता है, अपनी आकांक्षाओं को और इच्छाओं को पूरी करने के लिए परमात्मा से प्रार्थना करता है आशीर्वाद मांगता है. और कई बार तो मन्नते मांगता है. प्रलोभन इंसान के अपने ही स्वभाव में है इसलिए शायद इंसान सोचता है की मन्नत के रूप में परमात्मा को प्रलोभन देने से परमात्मा इंसान की मुराद पूरी कर देगा. कई बार इंसान अपने आप को मन्नत के रूप में कष्ट देता है यह सोच कर की परमात्मा उन पर दया करेगा. किसी न किसी रूप में या तो परमात्मा को खुश करने की कोशिश है या परमात्मा की कृपा पाने की कोशिश है. पर यह सब बाते इंसान की अपनी निजी आस्था का सवाल है. सही सवाल यह है की क्या वाकई जो हम समझते है परमात्मा के बारे में या जिस रूप में हम परमात्मा को मानते है समझते है वेसा परमात्मा है? क्या परमात्मा से संपर्क बनाना या उनसे वार्तालाप करना संभव है?

मैं यह यकीन से कह सकता हूँ की मैंने खुद के भीतर मौजूद परमात्मा को महेसुस किया है. वह अनुभूति मैं आपको बता तो नहीं सकता पर वह अनुभूति केसे हो सकती है यह तरीका जरुर बता सकता हूँ. मैं यहाँ कोई एसा दावा नहीं कर रहा की मैं कोई सद्गुरु हूँ या कोई संत हूँ. आपमें और मुझमे यदि कोई फर्क है तो वह है अपनी चेतना का स्तर.  में इस पुस्तक के माध्यम से आपको परमात्मा से संपर्क का तरीका बताऊंगा. जेसे की मैंने कहा परमात्मा हमारे भीतर ही है बाहर नहीं. हमे ही चेतना के स्तर को विक्सित करके अपनी चैतसिक शक्तियों को जगाकर अपने इश्वरत्व का एहसास करना है. गुरु तो केवल मार्गदर्शन करता है.

जेसे किसी भी दुसरे इंसान से हम सपर्क करते हे तो वार्तालाप जरुर होता है. और सफल वार्तालाप के लिए जरुरी हे भाषा का ज्ञान होना. यदि दोनों इंसान की भाषा एक ही है तो वार्तालाप सरल हो जाता है. लेकिन यदि भाषा समान नहीं है तो दुसरे इंसान से वार्तालाप कठिन हो जाता है.   

हर इंसान ने परमात्मा को किसी न किसी रूप में अपने बाहर ही देखने की कोशिश की है. कभी भी अपने भीतर झाँकने की कोशिश नहीं की.

कुछ लोग यह मानते है की इश्वर उनकी प्रार्थना सुनता है और उनकी प्रार्थना का जवाब देता है. लेकिन यह सत्य है की जब कभी भी आपने जीवन में यह अनुभव किया हो की आपकी प्रार्थना फलीभूत हुयी तो वह किसी मंदिर या गिरजाघर में मौजूद भगवन की वजह से नहीं किन्तु आपकी अपनी चेतना की शक्ति का ही परिणाम था. प्रार्थना या ध्यान की अवस्था में चेतना अपने आप विक्सित होती है और इस विक्सित चेतना की शक्ति की वजह से, कभी कभार हमारा  संकल्प सिद्ध हो जाता है. लेकिन तब भी हम इस बात का श्रेय मंदिर में मौजूद मूर्ति को देते है अपने भीतर के परमात्मा को नहीं.

अपने भीतर मौजूद परमात्मा से संपर्क और वार्तलाप तब ही संभव है जब हम परमात्मा की भाषा को समझें. इस के लिए पहेली शर्त यह है की हम खुद को परमात्मा का ही अंश माने और अपने ‘अहम्’ को छोड़ें. हम यह जानते है की एक डॉक्टर यदि दुसरे डॉक्टर से बात करेगा तो उनकी भाषा और बातचीत के विषय की स्पष्टता दुसरे इंसान के साथ बातचीत के परिपेक्ष्य में बिलकुल भिन्न होगी. एक डॉक्टर दुसरे डॉक्टर से जिस स्पष्टता से बात कर सकता है उतनी स्पष्टता से डॉक्टर एक सामान्य इंसान के साथ वार्तालाप नहीं कर पायेगा. उसी प्रकार अगर एक संगीतकार दुसरे संगीतकार से बात करेगा वह सामान्य इंसान के मुकाबले वार्तालाप से भिन्न होगा. बात का तात्पर्य यह है की दो समान व्यवसाय के इंसान एक दुसरे के साथ ज्यादा स्पष्टता से वार्तालाप कर पायेंगे उतना ही नही किन्तु उन्हें समान व्यवसाय वाले इंसान से वार्तालाप करने में सामान्य इंसान से वार्तालाप के मुकाबले ज्यादा सरल होगा और ज्यादा आनंद आएगा. एक व्यवसायी दुसरे समान व्यवसाय वाले इंसान के साथ निरंतर संपर्क में रहेना चाहेगा. इसकी वजह यह है की समान व्यवसाय वाले इंसानों की सोच में समानता होती है और उन्हें उपयोग में लिए जानेवाली शब्दावली का भी ज्ञान होता है जब की दुसरे सामान्य इंसान की न तो सोच समान होती है ना ही उन्हें शब्दावली का ज्ञान होता है. अन्य समान्य इंसानों के साथ वह सिमित रूप से सिर्फ जितनी जरुरत है उतनी ही बात करेगा और जरुरत से ज्यादा बात करना टालेगा.

यही तर्क परमात्मा से वार्तालाप के बारे में भी लागु होता है. जब तक आप परमात्मा को खुद से भिन्न मानेंगे तब तक आप परमात्मा से उत्कृष्ट और बहु आयामी रूप से संपर्क नहीं बना पायेंगे. जैसे दो समान सोच वाले समान व्यावसायी या कलाकार मिलते हे तो दोनों मिलकर एक उत्कृष्ट और नयी रचना को जन्म दे सकते है. जब दो कलाकार या संगीतकार साथ मिलकर किसि रचना को जन्म देते है तब किसी में भी अहम् नहीं होता. दोनों एक दुसरे के पूरक बन जाते है. हो सकता है किसी बात पे दोनों में मतभेद हो लेकिन मनभेद नहीं होता. अंततः दोनों में ऐक्य का ही भाव होता है. दोनों मिलकर एक दुसरे के प्रयास में मूल्य वृद्धि ही करते है ताकि रचना अधिक से अधिक उत्कृष्ट हो. यह हो सकता है की दोनों में एक सकारात्मक स्पर्धा हो. यह भी संभव है की दोनों एक दुसरे के ज्ञान की और कौशल्य की कसोटी करें लेकिन मकसद सकारात्मक है. इस प्रकार के रिश्ते में न ही कोई गुरु है न हीं कोई शिष्य . हमारे भीतर जो परमात्मा है उनके साथ हमारा रिश्ता भी कुछ ऐसा ही है.

जब हम परमात्मा को अपने भीतर खोजना शुरू करते है और अपनी ही चतासिक ईश्वरीय शक्तियों को जाग्रत करने का निर्णय लेते है तभी परमात्मा से हमारे संपर्क की प्रक्रिया शुरू हो जाती है. इसलिए हमे अपने आपको स्वयम इश्वर का अंश इश्वर का ही स्वरुप समझना होगा. शुरू में यह कठिन है लेकिन इसके लिए अपने आप को अपने शरीर को परमात्मा को समर्पित करना होगा तभी जैसे जैसे चेतना विकसित होती जायेगी इश्वर की अनुभूति और परिपक्व होती जायेगी. लेकिन जेसे दो कलाकार जब मिलकर कलाकृति की रचना करते है और एक दुसरे को सकारात्मक रूप से चुनौती देते है और एक दुसरे के ज्ञान और कौशल्य को बढाते है ,ठीक वैसा ही परमात्मा हमारे साथ करता है. परमात्मा हमारे जीवन में चुनौतियां पैदा करता है लेकिन साथ ही साथ मार्गदर्शन भी करता है. लेकिन यह मार्गदर्शन की भाषा और शब्दावली को समझना बहुत जरुरी है. हम यह मार्गदर्शन को अपनी चैतसिक शक्तियों के रूप में अनुभव करते है.

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